राजस्थान में 72 लाख किसान लेकिन सिर्फ 101 मिट्टी प्रयोगशालाएँ — सरकार की कृषि नीति पर बड़ा सवाल

 By  Research cover desk

राजस्थान भारत का सबसे बड़ा राज्य है — भूमि के मामले में भी और किसानों की मेहनत के मामले में भी। लेकिन जब बात आती है कृषि विज्ञान, मिट्टी की गुणवत्ता, और वैज्ञानिक खेती की, तो यहाँ की तस्वीर बेहद चिंताजनक हो जाती है।
एक तरफ राज्य में 72 लाख से अधिक किसान हैं, वहीं दूसरी तरफ पूरे प्रदेश में सिर्फ 101 मिट्टी परीक्षण प्रयोगशालाएँ
यह आँकड़ा न केवल असंतुलित है बल्कि यह सरकार की कृषि नीति और प्राथमिकताओं की विफलता को भी उजागर करता है।

"A Rajasthan farmer looking over barren land representing shortage of soil testing labs in the state"
A farmer looking toward the hopes of Rajasthan.


राजस्थान में मिट्टी परीक्षण प्रयोगशालाओं की कमी और सरकारी नाकामी



1. मिट्टी परीक्षण का महत्व — खेती की नींव यहीं से शुरू होती है

हर किसान जानता है कि फसल की जड़ सिर्फ बीज नहीं, बल्कि मिट्टी होती है। मिट्टी की सही जांच के बिना कोई भी किसान यह नहीं जान सकता कि उसकी जमीन में कौन-से पोषक तत्वों की कमी है, कौन-सा उर्वरक कितनी मात्रा में देना चाहिए, या कौन-सी फसल उस मिट्टी के लिए सबसे उपयुक्त है।

मिट्टी परीक्षण प्रयोगशालाओं का काम है —

  • भूमि की pH value,

  • नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश की मात्रा,

  • और सूक्ष्म पोषक तत्वों की स्थिति का आकलन करना।

लेकिन जब राजस्थान जैसे विशाल राज्य में प्रत्येक प्रयोगशाला पर 70 हजार से अधिक किसानों का भार पड़ता हो, तो ऐसे में सही परीक्षण की उम्मीद करना ही मुश्किल है।




2. आँकड़ों में राजस्थान की सच्चाई

  • कुल भूमि क्षेत्र: 3.42 लाख वर्ग किमी (342 लाख हेक्टेयर)

  • कृषि योग्य भूमि: 272 लाख हेक्टेयर

  • किसानों की संख्या: लगभग 72 लाख

  • मिट्टी परीक्षण प्रयोगशालाएँ: केवल 101

अब ज़रा सोचिए — 272 लाख हेक्टेयर भूमि का परीक्षण करने के लिए मात्र 101 लैब्स हैं। इसका अर्थ है कि हर प्रयोगशाला पर लगभग 2.7 लाख हेक्टेयर भूमि का भार है। क्या यह किसी भी दृष्टि से व्यावहारिक है?




3. जब नीति और नीयत दोनों कमजोर हों

राजस्थान सरकार हर बजट में कृषि सुधार, किसान कल्याण और स्मार्ट कृषि की बातें करती है। परंतु ज़मीनी सच्चाई यह है कि कृषि सुधार की दिशा में ठोस ढाँचा तैयार ही नहीं किया गया। राज्य के अधिकांश जिलों में मिट्टी परीक्षण केंद्र सिर्फ “कागज़ों” में दर्ज हैं, और जो कार्यरत हैं, वहाँ मशीनें पुरानी, स्टाफ सीमित और फंड अपर्याप्त हैं।

यह प्रश्न स्वाभाविक है —

“जहाँ 200 विधायक हैं, वहाँ 200 लैब्स क्यों नहीं?”

हर विधायक अगर अपने क्षेत्र में एक मिट्टी परीक्षण लैब भी बनवाए, तो राजस्थान में अगले छह महीनों में 200 से अधिक नई प्रयोगशालाएँ बन सकती हैं। लेकिन राजनीतिक इच्छा-शक्ति का अभाव आज भी सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है।



4. किसानों पर इसका सीधा असर

मिट्टी परीक्षण के अभाव में किसान “अनुमान आधारित खेती” करते हैं। वे नहीं जानते कि उनकी भूमि में कौन-से तत्वों की कमी है। इसका सीधा परिणाम यह होता है कि —

  • किसान अधिक उर्वरक डालता है, जिससे मिट्टी की उर्वरता घटती है

  • सिंचाई और लागत दोनों बढ़ते हैं।

  • और अंत में फसल उत्पादन घटता है

इस स्थिति में किसानों की मेहनत का परिणाम निराशा बन जाता है। मिट्टी की सेहत बिगड़ने से भूमि बंजर होती जा रही है, और किसान कर्ज़ के बोझ में दबते जा रहे हैं।







5. सरकार की योजनाएँ — कागज़ से ज़मीन तक नहीं पहुँचीं

राजस्थान सरकार ने कई बार “मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना” और “डिजिटल मिट्टी परीक्षण पोर्टल” की घोषणा की।
लेकिन ज़मीनी अमल लगभग शून्य रहा।

  • गाँव-स्तर पर लैब्स खोलने की बात हुई, लेकिन ज़्यादातर फंड रिलीज़ ही नहीं हुए

  • मोबाइल लैब वैन की घोषणा हुई, परन्तु अधिकांश जिलों में एक भी वैन चालू नहीं हुई

  • किसानों को मिट्टी रिपोर्ट देने के लिए ऑनलाइन पोर्टल बनाया गया, लेकिन डेटा अपलोड करने के लिए प्रशिक्षित कर्मी नहीं हैं।

यह सब दर्शाता है कि नीतियाँ सिर्फ घोषणा-पत्रों तक सीमित हैं, कार्यान्वयन में इच्छाशक्ति का अभाव है।




6. तुलनात्मक दृष्टि — राजस्थान क्यों पीछे है

राज्य                किसानों की संख्या          मिट्टी लैब्स           प्रति लैब किसान       स्थिति
पंजाब~11 लाख~118~9,300उत्कृष्ट
गुजरात~45 लाख~180~25,000संतोषजनक
राजस्थान~72 लाख~101~71,300बेहद कमजोर

स्पष्ट है कि राजस्थान न केवल क्षेत्रफल में सबसे बड़ा राज्य है, बल्कि मिट्टी परीक्षण ढाँचे में सबसे पिछड़ा भी है।




7. क्यों ज़रूरी है मिट्टी परीक्षण में निवेश

राजस्थान का लगभग 70% क्षेत्र शुष्क और अर्ध-शुष्क है। यहाँ की खेती बरसात पर निर्भर रहती है। ऐसे में मिट्टी की संरचना, नमी और पोषक तत्वों की जानकारी होना अत्यंत आवश्यक है।

मिट्टी परीक्षण के लाभ:

  1. उर्वरक उपयोग में 20-25% तक कमी आती है।

  2. फसल उत्पादन में 10-15% की वृद्धि होती है।

  3. भूमि की उर्वरता लंबे समय तक बनी रहती है।

  4. किसानों की लागत घटती है, लाभ बढ़ता है।

इसलिए यह कोई खर्च नहीं, बल्कि भविष्य में निवेश है।



8. क्या कर सकती है सरकार

  1. प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में कम से कम एक मिट्टी लैब अनिवार्य की जाए।

  2. ब्लॉक-स्तर पर मोबाइल मृदा परीक्षण वैन चलाई जाएँ।

  3. कृषि विश्वविद्यालयों और निजी कॉलेजों को मिट्टी परीक्षण में जोड़ा जाए।

  4. राज्य निधि (MLA Fund) से प्रयोगशालाओं के निर्माण के लिए प्रावधान किया जाए।

  5. डिजिटल पोर्टल पर हर किसान का “मिट्टी हेल्थ कार्ड” ऑनलाइन उपलब्ध कराया जाए।




9. किसानों की आवाज़ — “हमारी जमीन थक चुकी है”

राजस्थान के कई जिलों के किसान यह स्वीकार करते हैं कि उनकी भूमि पहले जैसी उपजाऊ नहीं रही। उर्वरकों का अधिक उपयोग, रासायनिक कीटनाशकों की अधिकता, और अनजान फसल चक्र ने मिट्टी को कमजोर कर दिया है। लेकिन जब तक उन्हें अपनी मिट्टी की सटीक रिपोर्ट नहीं मिलेगी, तब तक वे सुधार की दिशा में कदम नहीं उठा पाएंगे।

यहाँ सरकार की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है — क्योंकि किसान अकेला अपनी जमीन नहीं बचा सकता, उसे नीतिगत मदद की आवश्यकता है।




10. निष्कर्ष — जब किसान की मिट्टी बीमार हो, तो सरकार को ज़िम्मेदार ठहराना होगा

राजस्थान की कृषि नीति पर यह एक कड़ा सवाल है कि इतने विशाल राज्य में सिर्फ 101 मिट्टी परीक्षण प्रयोगशालाएँ क्यों हैं। 72 लाख किसानों और 272 लाख हेक्टेयर भूमि की तुलना में यह संख्या बेहद शर्मनाक है।

सरकार को यह समझना होगा कि

“कृषि सुधार का पहला कदम बीज नहीं, मिट्टी होती है।”

जब तक हर किसान अपनी मिट्टी की स्थिति नहीं जानेगा, तब तक कोई भी योजना — चाहे वह फसल बीमा हो, सिंचाई योजना हो या किसान सम्मान निधि — पूर्ण लाभ नहीं दे सकती।

राजस्थान की भूमि आज अपने “मालिकों” यानी किसानों से मदद माँग रही है। अब यह राज्य सरकार की जिम्मेदारी है कि वह इस पुकार को सुने — क्योंकि अगर मिट्टी ही बीमार होगी, तो किसानी कब तक ज़िंदा रहेगी?




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