Rajasthan Urea Black Marketing: सिरोही से सीकर तक जिला-स्तरीय खुलासे | Part-2
by Dipansu
Rajasthan Urea Black Marketing
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| Urea supply truck loading for district distribution amid fertilizer demand |
13. सिरोही जिला: जब गोदाम में 558 बोरे आए और निकले सिर्फ 410
सिरोही जिला 2024–25 के रबी सीजन में यूरिया संकट का सबसे बड़ा उदाहरण बनकर सामने आया। यहाँ समस्या सिर्फ सप्लाई की नहीं थी, बल्कि सीधे-सीधे गड़बड़ी और कालाबाज़ारी की पुष्टि हुई।
राजकीय सहकारी समिति के गोदाम में 558 बोरे यूरिया पहुँचने का रिकॉर्ड था। लेकिन जब किसानों ने गोदाम खुलवाया, तो वहाँ सिर्फ 410 बोरे निकले, यानी 148 बोरे रहस्यमय तरीके से गायब
किसानों की प्रतिक्रिया:
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किसानों ने समिति के बाहर प्रदर्शन किया, आरोप लगाया कि बोरे रातों-रात बाहर बेचे गए
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कई किसानों ने यह भी बताया कि उन्हें ₹400–₹500 में वही बोरा बाजार में दिखा, जो समिति में ₹266 में मिलना चाहिए था
प्रशासन की कार्रवाई:
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जांच के आदेश दिए गए
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समिति के कर्मचारियों से जवाब-तलब किया गया
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स्टॉक रजिस्टर सीज किया गया
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जिला प्रशासन ने माना कि “रिकॉर्ड और वास्तविक स्टॉक में अंतर है”
सिरोही केस ने पूरे प्रदेश में यह साबित कर दिया कि कमी सिर्फ उत्पादन या आयात की वजह से नहीं थी, बल्कि अंदरूनी गड़बड़ी भी बड़ी वजह थी।
14. बारां जिला: रात 11 बजे से लाइन, सुबह तक भी खाद नहीं
बारां जिला हाड़ौती क्षेत्र का एक अहम कृषि क्षेत्र है। यहाँ गेहूं और चना की खेती बड़े स्तर पर होती है। रबी सीजन में अचानक यूरिया की कमी ने किसानों को सड़कों पर ला दिया।
किसान रात 11 बजे से ट्रैक्टर लगाकर लाइन में लगते थे, सुबह 9–10 बजे तक जब गोदाम खुलता था, तब तक कई बार स्टॉक खत्म हो चुका होता
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300 किसानों की लाइन में से सिर्फ 100 किसानों को ही खाद मिल पाती थी
किसानों की मजबूरी:
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जिन किसानों को सरकारी दर पर खाद नहीं मिली, उन्हें:
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बाज़ार से ₹450–₹600 में बोरा खरीदना पड़ा
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कई गरीब किसान खाद नहीं खरीद पाए और:
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फसल पीली पड़ गई
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उत्पादन पर सीधा असर पड़ा
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प्रशासन का बयान:
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जिला प्रशासन ने कहा कि:
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“रैक देरी से आ रहा है, अगले 48 घंटे में सप्लाई सुधारी जाएगी।
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लेकिन वास्तविकता यह थी कि कई सप्ताह तक स्थिति सामान्य नहीं हो पाई।
15. सीकर जिला: सबसे ज्यादा खेती, सबसे ज्यादा लाइनें
सीकर राजस्थान का सबसे बड़ा कृषि जिलों में से एक है। यहाँ बड़ी संख्या में सरसों और गेहूं की खेती होती है। रबी सीजन में अचानक यूरिया की मांग इतनी बढ़ी कि पूरी वितरण प्रणाली चरमरा गई।
समस्या की जड़:
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मांग: लगभग 28,000 MT
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वास्तविक उपलब्धता: करीब 20,000 MT
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कमी: लगभग 8,000 MT
लगभग हर तहसील में लंबी कतारें लगी, कई जगहों पर महिलाएँ भी सुबह 4 बजे लाइन में खड़ी दिखीं।
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कुछ जगहों पर धक्का-मुक्की और झड़पें हुईं
कालाबाज़ारी:
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सरकारी बोरा ₹266 का
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बाज़ार में वही बोरा ₹500–₹650 में बिकता मिला
प्रशासनिक कदम:
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स्टॉक की ऑनलाइन मॉनिटरिंग शुरू की गई
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बिना आधार कार्ड यूरिया बिक्री पर रोक लगाई गई
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कई डीलरों को कारण बताओ नोटिस भेजे गए
फिर भी पूरे सीजन में सीकर जिले में स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं हो सकी।
16. झुंझुनूं जिला: सहकारी समितियाँ खाली, निजी डीलर सक्रिय
झुंझुनूं जिले में समस्या थोड़ी अलग थी। यहाँ आरोप यह लगे कि:
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सहकारी समितियों में स्टॉक नहीं था
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लेकिन निजी डीलरों के पास यूरिया उपलब्ध था — वो भी महंगे दाम पर
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समितियाँ कहती थीं — “आज स्टॉक नहीं आया”
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वहीं निजी दुकानों पर:
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वही यूरिया खुलेआम बिक रहा था
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रेट ₹500 से ऊपर
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किसानों का आरोप था कि:
“सरकारी स्टॉक पहले निजी डीलरों के पास पहुँचा, फिर वहाँ से महंगे दाम पर बेचा गया।”
जांच:
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कृषि विभाग ने 3 दुकानों की जांच की
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स्टॉक रजिस्टर में अनियमितता पाई गई
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2 लाइसेंस अस्थायी रूप से निलंबित किए गए
17. दौसा जिला: यूरिया के लिए सड़क जाम और प्रदर्शन
दौसा जिले में स्थिति उस समय बिगड़ गई जब:
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लगातार 10–12 दिन तक यूरिया नहीं मिला
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समिति गोदामों पर “स्टॉक खत्म” का बोर्ड लगा दिया गया
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किसानों ने तहसील कार्यालय के बाहर प्रदर्शन किया
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कुछ जगहों पर सड़क जाम किया
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प्रशासन को मौके पर पुलिस बुलानी पड़ी
किसानों का असर:
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कई किसानों ने बताया कि:
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गेहूं की पहली खुराक समय पर नहीं मिल पाई
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फसल कमजोर हो गई
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18. उदयपुर जिला: आदिवासी क्षेत्रों में सबसे गहरा संकट
उदयपुर और आसपास के आदिवासी क्षेत्रों में:
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छोटे किसान, सीमांत जोत, सीमित संसाधन - यहाँ संकट का असर सबसे दर्दनाक रहा।
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कई गाँवों में:
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3–4 सप्ताह तक यूरिया नहीं पहुँचा
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लोग ट्रैक्टर किराये पर लेकर:
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40–50 किलोमीटर दूर शहर पहुँचे
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फिर भी कई बार:
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खाली हाथ लौटना पड़ा
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कालाबाज़ारी:
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यहाँ ₹266 का बोरा ₹550–₹700 तक बिकता मिला
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गरीब किसान मजबूर होकर:
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महंगे दाम पर खरीदने को मजबूर हुए
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19. अलवर, बूंदी, भीलवाड़ा और झालावाड़: कागज़ों में अधिशेष, जमीन पर तनाव
दिलचस्प बात यह रही कि:
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सरकारी रिकॉर्ड में इन जिलों में:
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मांग से ज्यादा सप्लाई दिखाई गई
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लेकिन जमीनी स्तर पर:
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यहाँ भी शिकायतें मिलीं
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अलवर:
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कुछ तहसीलों में स्टॉक भरा था, कुछ में बिल्कुल खाली, वितरण में भारी असमानता
बूंदी और झालावाड़:
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बड़े किसानों को पहले खाद, छोटे किसान पीछे रह गए
यह दिखाता है कि सप्लाई से ज्यादा समस्या “वितरण तंत्र” में थी।
20. कालाबाज़ारी का पूरा नेटवर्क कैसे काम करता है?
यूरिया की कालाबाज़ारी सिर्फ एक व्यक्ति नहीं करता — यह पूरा नेटवर्क होता है:
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गोदाम से कटौती
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रजिस्टर में हेराफेरी
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निजी डीलरों तक सीधी सप्लाई
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महंगे दाम पर नकद बिक्री
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दूसरे जिलों/राज्यों में ट्रांसफर
इस नेटवर्क में:
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कुछ गोदाम कर्मचारी, कुछ ट्रांसपोर्टर, कुछ निजी डीलर और कभी-कभी बिचौलिए भी शामिल रहते हैं
21. फर्जी खाद फैक्ट्रियाँ और मिलावटी यूरिया
राजस्थान के किशनगढ़, सांचौर और आसपास के क्षेत्रों में:
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फर्जी खाद फैक्ट्रियाँ पकड़ी गईं
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नकली कंपनियों के नाम से:
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घटिया सामग्री भरकर बोरे तैयार किए गए
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किसानों को:
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यह कहकर बेचा गया कि यह असली यूरिया है
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असर
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खेत में डालने पर:
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कोई असर नहीं हुआ
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फसल खराब
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किसान को सीधा आर्थिक नुकसान
22. सरकार की बड़ी कार्रवाई
राज्य सरकार और कृषि मंत्री स्तर पर:
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90 से अधिक FIR
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98 से ज्यादा डीलरों के लाइसेंस निलंबित
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कई फैक्ट्रियाँ सील
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हजारों बोरे जब्त
यह कार्रवाई यह साबित करती है कि:
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समस्या केवल सप्लाई की नहीं
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अंदरूनी भ्रष्टाचार भी बड़ा कारण था।
23. किसान की असली पीड़ा: फसल से लेकर कर्ज तक
जब यूरिया समय पर नहीं मिला:
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गेहूं कमजोर, सरसों की ग्रोथ रुकी
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उत्पादन घटा, किसान की लागत बढ़ी
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आमदनी घटी, कर्ज का चक्र और गहरा हुआ
कुछ किसानों ने बताया:
“सरकार बोरा सस्ता देती है, लेकिन हमें वह सस्ते में मिल ही नहीं रहा।”

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