Rajasthan Urea Crisis 2025: उत्पादन, आयात और सब्सिडी की पूरी सच्चाई | Part-1
by Dipansu
राजस्थान एक कृषि प्रधान राज्य है, जहाँ की लगभग 65–70 प्रतिशत आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से खेती पर निर्भर है। राज्य के शेखावाटी क्षेत्र से लेकर हाड़ौती और मेवाड़ तक, रबी और खरीफ दोनों मौसमों में गेहूं, सरसों, चना, कपास, बाजरा, मूंगफली जैसी फसलों का बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है। इन सभी फसलों के लिए यूरिया (नाइट्रोजन उर्वरक) सबसे बुनियादी और आवश्यक खाद है।
2024 के अंत और 2025 की शुरुआत में राजस्थान के कई जिलों से ऐसी खबरें सामने आईं कि किसान यूरिया के लिए रात-रात भर लाइनें लगा रहे हैं, कई जगहों पर मारपीट हो रही है, ट्रैक्टरों की कतारें लग रही हैं, और कुछ जिलों में तो किसान कालाबाज़ारी के ऊँचे दाम पर यूरिया खरीदने को मजबूर हो रहे हैं।
इसी के साथ सरकार यह दावा कर रही है कि राज्य में पर्याप्त यूरिया उपलब्ध है, लेकिन जमीनी हालात कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं। यही विरोधाभास इस पूरे संकट का मूल है।
इस आर्टिकल के पहले भाग में हम समझेंगे:
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यूरिया क्या है और खेती में इसकी भूमिका
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भारत में यूरिया का उत्पादन, मांग और आयात
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राजस्थान में यूरिया की वास्तविक जरूरत
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राज्य-स्तरीय आपूर्ति व्यवस्था कैसे काम करती है
आगे के भागों में हम कालाबाज़ारी, फर्जी खाद, जिलावार संकट, छापेमारी, FIR, किसानों की परेशानियाँ और समाधान — सब कुछ विस्तार से कवर करेंगे।
राजस्थान का किसान और यूरिया की जंग
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| Rajasthan farmer applying urea in field amid fertilizer supply challenges |
1. यूरिया क्या है और यह किसान के लिए क्यों ज़रूरी है?
यूरिया एक रासायनिक नाइट्रोजन उर्वरक है, जिसमें लगभग 46% नाइट्रोजन होता है। नाइट्रोजन पौधों की वृद्धि के लिए सबसे आवश्यक पोषक तत्वों में से एक है। यह:
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पौधों की हरी पत्तियों को विकसित करता है
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तनों को मजबूत बनाता है
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उपज बढ़ाने में मुख्य भूमिका निभाता है
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गेहूं, धान, सरसों, गन्ना, कपास जैसी फसलों के लिए अनिवार्य है
यदि समय पर और उचित मात्रा में यूरिया न मिले, तो:
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फसल पीली पड़ने लगती है
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बढ़त रुक जाती है
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पैदावार 25–40% तक घट सकती है
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किसान की पूरी आर्थिक गणना बिगड़ जाती है
इसीलिए यूरिया की कमी सीधे-सीधे किसान की आय और खाद्य सुरक्षा दोनों को प्रभावित करती है।
2. भारत में यूरिया उत्पादन की वास्तविक स्थिति
भारत दुनिया के सबसे बड़े यूरिया उपभोक्ताओं में से एक है। हर साल करोड़ों टन यूरिया देश में खपत होता है।
(A) भारत में घरेलू उत्पादन
भारत में सरकारी और निजी क्षेत्र की कई बड़ी यूरिया फैक्ट्रियाँ हैं:
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IFFCO
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NFL (National Fertilizers Limited)
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Kribhco
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Chambal Fertilizers
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RCF
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HFCL आदि
देश का सालाना घरेलू उत्पादन लगभग:
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300–320 लाख मीट्रिक टन (30–32 मिलियन टन) के बीच रहता है।
यह उत्पादन सरकार के भारी सब्सिडी तंत्र पर चलता है। गैस की कीमत, परिवहन लागत और उत्पादन खर्च बहुत अधिक है, फिर भी किसानों को सस्ते दाम पर यूरिया दिया जाता है।
(B) राष्ट्रीय स्तर पर मांग
भारत में यूरिया की सालाना मांग लगभग 340–350 लाख मीट्रिक टन तक पहुँच जाती है। यानी हर साल 20–40 लाख मीट्रिक टन यूरिया की कमी घरेलू उत्पादन से रह जाती है।
इसी कमी को पूरा करने के लिए भारत को हर साल विदेशों से यूरिया आयात (Import) करना पड़ता है।
3. भारत यूरिया आयात क्यों करता है?
यूरिया उत्पादन पूरी तरह प्राकृतिक गैस पर आधारित होता है। भारत की अपनी गैस उत्पादन क्षमता सीमित है। साथ ही:
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गैस की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उतार-चढ़ाव
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घरेलू फैक्ट्रियों की सीमित क्षमता
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पुरानी तकनीक वाली यूनिट्स
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बढ़ती खेती और जनसंख्या की जरूरत
इन सभी कारणों से भारत को मजबूरी में यूरिया विदेशों से खरीदना पड़ता है।
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4. भारत यूरिया कहाँ-कहाँ से आयात करता है?
भारत मुख्य रूप से इन देशों से यूरिया मंगाता है:
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क़तर (Qatar)
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ओमान (Oman)
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सऊदी अरब (Saudi Arabia)
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रूस (Russia)
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मिस्र (Egypt)
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ईरान (कुछ वर्षों में)
ये देश प्राकृतिक गैस से भरपूर हैं और बड़े स्तर पर सस्ता यूरिया बनाते हैं।
5. आयातित यूरिया की लागत (₹ में)
अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में 2024–25 के दौरान यूरिया की औसत कीमत $340 से $550 प्रति मीट्रिक टन रही। अगर डॉलर ₹83 मानें तो:
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न्यूनतम लागत ≈ ₹28,000 प्रति टन
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अधिकतम लागत ≈ ₹45,000–₹46,000 प्रति टन
एक मीट्रिक टन में लगभग 22 बोरे (45-45 किलो) होते हैं।
इस हिसाब से:
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सरकार को एक बोरा ₹1,300 से ₹2,050 तक पड़ता है।
6. किसान को इतना सस्ता
किसान को बाजार भाव पर यूरिया नहीं दिया जाता। सरकार भारी सब्सिडी देती है।
किसान को ₹242 से ₹266.50 प्रति 45 किलो बोरा ही देना पड़ता है। यानि सरकार हर बोरे पर ₹1,100 से ₹1,800 तक की सब्सिडी देती है। यह सब्सिडी सीधे कंपनियों को दी जाती है, ताकि किसान को सस्ता खाद मिले।
7. राजस्थान में यूरिया की कुल जरूरत कितनी है?
राजस्थान में खेती का रकबा बहुत बड़ा है:
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रबी में गेहूं, सरसों, चना
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खरीफ में बाजरा, मूंगफली, कपास
राज्य की औसत यूरिया जरूरत:
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रबी सीजन में: 6–7 लाख मीट्रिक टन
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खरीफ सीजन में: 5–6 लाख मीट्रिक टन
यानी पूरे साल में:
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लगभग 12–13 लाख मीट्रिक टन यूरिया की जरूरत राजस्थान को होती है।
8. राजस्थान को यूरिया कैसे मिलता है? (सरकारी आपूर्ति सिस्टम)
राजस्थान खुद यूरिया का उत्पादन बहुत सीमित करता है। ज्यादातर यूरिया:
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दूसरे राज्यों की फैक्ट्रियों
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और आयातित स्टॉक से रेल रैक के जरिए आता है।
आपूर्ति का सरकारी सिस्टम:
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केंद्र सरकार राज्यों का कोटा तय करती है
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हर 15 दिन में राज्यों को रैक अलॉट होते हैं
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रैक से जिला गोदामों तक
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वहाँ से:
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सहकारी समितियाँ
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निजी डीलर
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किसान सेवा केंद्र
के माध्यम से किसानों तक वितरण
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हर जिला अपने फसल क्षेत्र के आधार पर कोटा मांगता है।
9. 2024–25 में राजस्थान में संकट
इस बार संकट के मुख्य कारण:
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रबी सीजन में गेहूं-सरसों का बड़ा रकबा
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मौसम अनुकूल होने से फसल की तेज बढ़त
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यूरिया की मांग अचानक बहुत बढ़ गई
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कुछ समय पर रेल रैक की सप्लाई धीमी रही
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कुछ जगहों पर डीलरों ने स्टॉक होल्डिंग की
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साथ ही कालाबाज़ारी और अवैध बिक्री
इन सब कारणों से कई जिलों में अचानक संकट गहरा गया।
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11. जिन जिलों में संकट सबसे ज्यादा दिखा (संक्षेप संकेत)
शुरुआती रिपोर्ट के अनुसार:
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सिरोही, बारां, सीकर, झुंझुनू, उदयपुर, दौसा
जैसे जिलों में किसानों को कई-कई दिन यूरिया नहीं मिला।
12. सरकार का आधिकारिक पक्ष क्या है?
राज्य सरकार का कहना है कि:
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“राजस्थान में यूरिया की कोई वास्तविक कमी नहीं है”
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“समय-समय पर पर्याप्त रैक भेजे जा रहे हैं”
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“कृत्रिम कमी कालाबाज़ारी के कारण बनती है”
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“डीलरों पर सख्त कार्रवाई चल रही है”
सरकार का दावा है कि:
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दिसंबर 2024 से जनवरी 2025 के बीच 1 लाख मीट्रिक टन से ज्यादा यूरिया राज्य को दिया गया।
लेकिन जमीनी हालात इन दावों से पूरी तरह मेल नहीं खाते।
13. क्या वास्तव में सप्लाई पर्याप्त थी?
कागज़ों में कई जिलों में:
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मांग से ज्यादा सप्लाई दिखाई गई
लेकिन हकीकत में: -
किसान को समय पर खाद नहीं मिली
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समितियों में “स्टॉक खत्म” बताया गया
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कुछ जगहों पर 1 बोरा भी नहीं मिला
यहीं से कालाबाज़ारी और गड़बड़ी की असली कहानी शुरू होती है।
(Sources) — भारत/सरकार स्तर
1. Fertilizers Scenario in the Country
2. Open Government Data Platform of India
निष्कर्ष
राजस्थान में यूरिया को लेकर जो हालात बन रहे हैं, वह सिर्फ एक अस्थायी आपूर्ति की समस्या नहीं है, बल्कि यह देश की उर्वरक नीति, आयात पर निर्भरता और वितरण व्यवस्था की जमीनी हकीकत को भी उजागर करता है। एक तरफ भारत हर साल करोड़ों टन यूरिया का उत्पादन और आयात करता है, सरकार किसानों को भारी सब्सिडी देकर इसे सस्ते दाम पर उपलब्ध भी कराती है, लेकिन दूसरी तरफ राज्य स्तर पर समय पर और समान वितरण एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
देश में यूरिया की कुल उपलब्धता और किसानों तक उसके पहुँचने के बीच एक बड़ा अंतर है। आयात, सब्सिडी और सरकारी दावों के बावजूद, यदि वितरण तंत्र कमजोर रहता है तो संकट बनना स्वाभाविक है। यह भी साफ है कि किसान की असली परेशानी उत्पादन या सब्सिडी से ज्यादा, सही समय पर खाद न मिलने से जुड़ी हुई है।
आगे आने वाले हिस्सों में हम देखेंगे कि यही प्रणालीगत कमजोरियाँ कैसे जिले-जिले में गंभीर संकट, कालाबाज़ारी और किसानों के संघर्ष का रूप ले लेती हैं।
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